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MHD-14 IGNOU Solved Assignment 2025-26 Available
निम्नलिखित गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए:
(क) “जन्म भर निर्लोभ रहने के बाद इस समय अपनी आत्मा का बलिदान करने में दारोगा जी को बड़ा दुख होता था। वह सोचते थे, यदि यही करना था तो आज से पच्चीस साल पहले ही क्यों न किया, अब तक सोने की दीवार खड़ी कर दी होती। इलाके ले लिए होते। इतने दिनों तक त्याग का आनंद उठाने के बाद बुढ़ापे में यह कलंक पर मन कहता था, इसमें तुम्हारा क्या अपराध? तुमने जब तक निभ सका, निबाहा। भोग विलास के पीछे अधर्म नहीं किया, लेकिन जब देश, काल, प्रथा, और अपने बंधुओं का लोभ तुम्हें कुमार्ग की ओर ले जा रहे है, तो तम्हारा दोष? तुम्हारी आत्मा अब भी पवित्र है। तुम ईश्वर के सामने अब भी निरपराध हो। इस प्रकार तर्क करके दारोगा जी ने अपनी आत्मा को समझ लिया।”
(ख) “जीवन-सूत्र कितना कोमल है। वह क्या पुष्प से कोमल नहीं, जो वायु के झोंके सकता है और मुरझाता नहीं? क्या वह लताओं से कोमल नहीं, जो कठोर वृक्षों के झोंके सहती और लिपटी रहती है? यह गया पानी के बबूलों से कोमल नहीं, जो जल की तरंगों पर तैरते हैं, और टूटते नहीं? संसार में और कौन-सी वस्तु इतनी कोमल इतनी अस्थिर, इतनी सारहीन है जिससे एक व्यंग्य, एक कठोर शब्द, एक अन्योक्ति भी दारुण, असह्य, घातक है। और इस भित्ति पर कितने विशाल कितने भव्य, कितने बृहदाकार भवनों का निर्माण किया जाता है।
(ग) “मैं कुछ नहीं चाहती। मैं इस घर का एक तिनका भी अपने साथ न ले जाऊँगी। जिस चीज पर मेरा कोई अधिकार नहीं, वह मेरे लिए वैसी ही है जैसी किसी गैर आदमी की चीज। मैं दया की मिखारिणी न बनूँगी। तुम इन चीजों के अधिकारी हो, ले जाओ। मैं जरा भी बुरा नहीं मानती। दया की चीज न जबरदस्ती दी जा सकती है। न जबरदस्ती ली जा सकती है। संसार में हजारों विधवाएँ है, जो मेहनत-मजूरी करके अपना निर्वाह कर रही है। मैं भी वैसे ही हूँ। मैं भी उसी तरह मजूरी करूँगी और अगर न कर सकेंगी, तो किसी गड्ढे में खूब मरूँगी। जो अपना पेट भी न पाल सके, उसे जीते रहने का, दूसरों का बोझ बनने का कोई हक नहीं है।
(घ) “किसान कुली बनकर कभी अपने भाग्य विधाता को धन्यवाद नहीं दे सकता, उसी प्रकार जैसे कोई आदमी व्यापार का स्वतंत्र सुख भोगने के बाद नौकरी की पराधनीता को पसंद नहीं सकता। संभव है कि अपनी दीनता उसे कुली बने रहने पर मजबूर करे, पर मुझे विश्वास है कि वह इस दासता से मुक्त होने का अवसर पाते ही तुरंत अपने घर की राह लेगा और फिर उसी टूटू-फूटे झोपड़े में अपने बाल बच्चों के साथ रहकर संतोष के साथ कालक्षेप करेगा। आपको इसमें कुछ संदेह हो तो आप कृषक कुलियों से एकांत में पूछकर अपना समाधान कर सकते है। मैं अपने अनुभव के आधार पर यह बात कहता हूँ कि आप लोग इस विषय में योरोप वालों का अनुकरण के आधार करके हमारी जातीय जीवन के सद्गुणों का सर्वनाश कर रहे हैं। योरोप्न में इंडिस्ट्रियलिज्म (औद्योगिकता) की जो उन्नति हुई उसके विशेष कारण थे। वहाँ के किसानों की दशा उस समय गुलामों से गयी-गुजरी थी, वह जमींदार के बंदी होते थे। इस कठिन कारावास के देखते हुए धनपतियों की कैद गनीमत थी। हमारे किसानों की आर्थिक दशा चाहे कितनी ही बुरी क्यों न हो, पर वह किसी के गुलाम नहीं है। अगर कोई उन पर अत्याचार करे तो वह अदालतों में उससे मुक्त हो सकते है। नीति की दृष्टि में किसान और जमींदार दोनों बराबर हैं।”
2. “प्रेमचंद साहित्य के क्षेत्र में बहुमुखी प्रतिभा के रचनाकार थे।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
3. रंगभूमि के चौपन्यासिक शिल्प का विवेचन कीजिए।
4. ‘प्रेमाश्रम’ में आदर्शवाद किस रूप में व्यक्त हुआ है? विचार कीजिए।
5. ‘गबन के रचनात्मक उद्देश्य पर प्रकाश बलिए।
6. निम्नलिखित विषयों पर टिप्पणी लिखिए-
क. प्रेमचंद की उपन्यास दृष्टि
ख सेवासदन की भाषा
ग. प्रेमचंद की पात्र योजना
घ. ज्ञानशंकर का चरित्र चित्रण



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