Description
BSKC-111 Solved Assignment 2026 Available
नोट – इस सत्रीय कार्य में दिए गए सभी प्रश्न अनिवार्य हैं।
प्रश्न 1 निम्नलिखित में से किन्हीं दो मचों की व्याख्या कीजिए –
a) उषो वाजेन वाजिनि प्रचेताः स्तोमं जुषस्व गृणतो मघोनि । पुराणी देवी युवतिः पुरन्धिरनुव्रतं चरसि विश्ववारे ।।
b) हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
c) सत्ये बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्मयज्ञः पृथिवीं धारयन्ति । सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्युरुं लोकं पृथ्वी नः कृणोतु ॥
d) येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः । यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥
प्रश्न 2 निम्नलिखित में से किसी दो पर टिप्पणी लिखिए वैदिक लेट् लकार, स्वरित, पद-पाठ
प्रश्न 3 किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
a. ऋग्वैदिक परंपरा में अग्रि देवता के स्वरूप का दार्शनिक एवं प्रतीकात्मक विश्लेषण कीजिए।
b. हिरण्यगर्भ सूक्त को सृष्टि-दर्शन का आधार-ग्रंथ मानते हुए, उसमें प्रतिपादित ईश्वर-तत्त्व की अवधारणा का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए तथा उपनिषदिक ब्रह्म-चिन्तन से उसकी तुलना कीजिए।
c. शिवसंकल्प सूक्त में वर्णित ‘मन’ की अवधारणा का मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक विश्लेषण कीजिए तथा भारतीय चिंतन-परंपरा में मन-नियंत्रण की भूमिका पर समीक्षात्मक टिपाणी कीजिए।
प्रश्न- 4 निम्नलिखित में से किसी एक की व्याख्या कीजिए
a) तदेतत् सत्यं मच्चेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥
b) यत् तदद्देश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ॥
a) नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥
प्रश्न – 5 मुण्डक उपनिषद् में प्रतिपादित ‘परा विद्या’ और ‘अपरा विद्या’ के सिद्धान्त का आलोचनात्मक विवेचन कीजिए ।
अथवा
मुण्डक उपनिषद् में वर्णित ‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया’ रूपक की दार्शनिक व्याख्या करते हुए जीव, आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध का समीक्षात्मक विश्लेषण कीजिए।



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